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भरष्टाचारियों का चक्रव्यूह और सच दिखाने की सज़ा - स्कूल की अनियमितताओं का खुलासा करने पहुँचे पत्रकार को बनाया बंधक, मारपीट की,बेज्जत किया – गभाना पुलिस पर भी उठे गंभीर सवाल।

अलीगढ़ जनपद का चंडौस ब्लॉक…

एक सरकारी स्कूल… टूटा-फूटा शौचालय…

विकलांगों के लिए बने टॉयलेट पर लटका ताला…

और हरे नीम के पेड़ की कटाई।

ये सिर्फ अनियमितताएँ नहीं थीं …ये उस सिस्टम की सड़ी हुई तस्वीरें थी जहाँ,

सच कैमरे में कैद होना सबसे बड़ा अपराध बन गया।

लेकिन जब इस सच्चाई को दिखाने के लिए एक पत्रकार वहाँ पहुँचा …तो उसे सम्मान नहीं…

बंधक बनाकर अपमान, मारपीट और मुकदमे का इनाम मिला।


 पत्रकारिता या जुर्म? – योगेश उपाध्याय के साथ जो हुआ वह रोंगटे खड़े कर देगा।

सूत्रों के मुताबिक

जब पत्रकार योगेश उपाध्याय कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय-1 में कवरेज करने पहुँचे,

तो स्कूल प्रशासन में हड़कंप मच गया।

क्योंकि कैमरा सिर्फ तस्वीर नहीं लेता 

घोटाले का चेहरा भी दिखाता है।


आरोप है कि

स्कूल स्टाफ ने पहले पत्रकार को रोका

फिर बाहर से बुलाए गए कथित गुंडा तत्वों ने घेर लिया

मोबाइल छीन लिया गया

वीडियो और फोटो डिलीट कर दिए गए

कमरे में बंद कर बंधक बनाया गया

गालियाँ… धमकियाँ…

और मारपीट के बाद जबरन माफीनामा लिखवाया गया

यह सब उस राज्य में हुआ जहाँ

प्रेस की आज़ादी का दावा किया जाता है।


सवाल नंबर 1 - स्कूल था या गुंडा माफियाओं का अड्डा?

जिस स्कूल में

 बच्चों के शौचालय जर्जर

 विकलांग शौचालय बंद

परिसर से हरा पेड़ काटा जा रहा था

वहीं

एक पत्रकार को बंधक बना लिया जाता है।

क्या यह सिर्फ स्टाफ का गुस्सा था?

या फिर किसी बड़े भ्रष्टाचार का डर?


 थाना गभाना पुलिस कीभूमिका पर उठे सबसे बड़े सवाल

पीड़ित पत्रकार किसी तरह छूटकर थाना गभाना पहुँचा।

तहरीर दी…

एफआईआर का भरोसा मिला…

लेकिन फिर कहानी पलट गई।

 पत्रकार की रिपोर्ट दर्ज नहीं

 उल्टा पत्रकार पर ही मुकदमा।

यहाँ से मामला सिर्फ एक हमले का नहीं रहा 

यह सिस्टम बनाम पत्रकार हो गया।


 क्या बिना “चढ़ावे” के नहीं लिखी जाती एफआईआर?

स्थानीय लोगों में चर्चा है—

“जिसकी पहुँच… उसका सच”

क्योंकि

अगर बंधक बनाकर मारपीट हुई थी

तो फिर

मेडिकल क्यों नहीं?

स्कूल स्टाफ से पूछताछ क्यों नहीं?

मोबाइल डेटा डिलीट करने वालों पर आईटी एक्ट क्यों नहीं?

और सबसे बड़ा सवाल 

पीड़ित ही आरोपी कैसे बन गया?

 वर्दी पर लगा पक्षपात का दाग

एक पुलिस अधिकारी

शपथ लेता है 

न्याय की,

 निष्पक्षता की,

 कानून की रक्षा की,

लेकिन जब वही पुलिस

सच दिखाने वाले को अपराधी बना दे

तो वर्दी पर सवाल उठना तय है।

पत्रकारों में उबाल - आज योगेश… कल कौन?

इस घटना के बाद पूरे इलाके के पत्रकारों में भारी आक्रोश है।

क्योंकि यह हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं 

पूरी पत्रकारिता पर हमला है।

आज योगेश उपाध्याय को बंधक बनाया गया

कल किसी और की बारी हो सकती है।

 उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमले  एक खौफनाक ट्रेंड

यह कोई पहला मामला नहीं है।

सवाल यह है-

सच दिखाने वालों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है?

भ्रष्टाचार उजागर करना अपराध कब से हो गया?

क्या सिस्टम को सिर्फ चुप पत्रकार चाहिए?

शिक्षा मंदिर या भ्रष्टाचार का गोदाम?

जिस जगह बच्चों को—

 शिक्षा

 संस्कार

संविधान

सिखाया जाना चाहिए था

वहीं से निकल रही है

गुंडागर्दी

बंधक बनाना

जबरन माफीनामा

यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं 

पूरे शिक्षा तंत्र पर तमाचा है।

 पीड़ित पत्रकार की मांग

योगेश उपाध्याय ने उच्च अधिकारियों को भेजे पत्र में माँग की है

 निष्पक्ष जांच

 मोबाइल डेटा डिलीट करने वालों पर केस

 बंधक बनाने वालों की गिरफ्तारी

 पुलिस की भूमिका की जांच

 बड़ा सवाल – पत्रकारों पर उत्पीड़न कब बंद होगा?

जब

सच दिखाना खतरा बन जाए

कैमरा उठाना अपराध बन जाए

और न्याय मांगना भी साजिश बन जाए

तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है।

मीडिया व (RPSS) की चेतावनी-

अगर इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो

 बड़ा आंदोलन

 धरना प्रदर्शन

 जिला मुख्यालय घेराव

की रणनीति बनाई जा रही है।

 यह सिर्फ खबर नहीं, सिस्टम की परीक्षा है

यह मामला तय करेगा

सच बचेगा या दबेगा?

पत्रकार सुरक्षित रहेगा या नहीं?

स्कूल शिक्षा का केंद्र रहेगा या सत्ता का अड्डा?

क्योंकि याद रखिए

 जब पत्रकार डरता है तो जनता अंधेरे में चली जाती है।


कैमरे में कैद सच…

स्कूल में कैद पत्रकार…

और थाने में कैद न्याय…

क्या यही है सिस्टम?

कौन देगा जबाब ?