हम लॉक डाउन के इस तीसरे चरण में भी इस वायरस को लेकर गंभीर
देशभर में व्यापक रूप से चल रहे कोरोना संकट से इस दौरान संक्रमित होते लोगों और संक्रमण के पश्चात मृत्यु को प्राप्त लोगों को देखकर यह तो तय है कि बच्चे, बूढ़े ,जवान, पुरुष हो या महिला, गरीब हो या अमीर, जातिगत स्तर पर किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय से संबंध रहने वाले व्यक्ति सब पर यह वायरस अपनी वक्र दृष्टि रखता है और अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध होने पर उनको अपना शिकार बनाता है ।
अपेक्षा यह की जाती है कि कोई भी व्यक्ति इस वायरस को सक्रिय होने के लिए अनुकूल परिस्थितियां न प्रदान करे फिर भी इस वायरस को सक्रिय होने हेतु अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध हो रही है क्योंकि हम लॉक डाउन के इस तीसरे चरण में भी इस वायरस को लेकर गंभीर नहीं है।
किसी भी खतरे के प्रति गंभीर न होने के कई कारण हो सकते हैं -
● खतरे से अनजान होना
● स्वयं को संभावित खतरे के प्रति प्रतिरोधक क्षमता से युक्त स्वस्थ और शक्ति संपन्न मानना
● जिजीविषा का ना होना
● सब कुछ जानते हुए भी अधीरता का प्रदर्शन करते हुए गलती करना व खतरे को आमंत्रण देना।
● बचाव संबंधी उपायों का पालन करने के संदर्भ में स्वयं द्वारा गढ़े गए तर्कों के आधार पर अपने नियम बनाना। ● डब्ल्यूएचओ एवं सरकारी एजेंसी द्वारा बताए गए नियमों में अपनी सुविधा अनुसार परिवर्तन करना।
● दूसरों के द्वारा खतरे से बचाव के साथ किए जाने वाले उपायों का अक्षरसः पालन करने पर उन्हें मूर्ख समझना।
● किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा इन नियमों का पालन करने हेतु निर्देशित करने पर उसे अपनी स्वतंत्रता में बाधा मानना।
● स्वयं के घर में लॉक डाउन के दौरान रहने हेतु सौहार्दपूर्ण वातावरण का न होना।
इन सभी कारक तत्वों में से सरकार अपनी ओर से आप को जागरूक करने एवं आपको लॉक डाउन के दौरान दैनिक उपभोग सामग्री की उपलब्धता एवं आपके आसपास के वातावरण की स्वच्छता तथा संक्रमित हो जाने पर आपके स्वास्थ्य के उचित रखरखाव की व्यापक व्यवस्था कर रही है लेकिन इसके अतिरिक्त जो अन्य कारक तत्व है उनका मूल हमारे द्वारा विवेक का त्याग कर संवेदना से शासित होना है। इसका उपाय हमें ही करना है। कृपया इस संकट की घड़ी में अपनी संवेदनाओं को ताक पर रखकर विवेक के आधार पर जीवन को शासित करें। हमें मात्र संवेदनाओं के उस सकारात्मक उपयोग की आवश्यकता है जो दूसरों का ख्याल रखने और दूसरों को खतरे से बचाने के लिए तर्क सम्मत एवं उपयोगी हो ।संवेदना ओं के अन्य उपयोग विवेक का नाश करते हैं और हमें खतरे के और नजदीक ले जाते हैं।
अतः आप सबसे निवेदन है कि विवेक का प्रयोग करते हुए घर पर रहें सुरक्षित रहें।
डॉ अमित कुमार मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र, हेमवती नंदन बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नैनी, प्रयागराज
रिपोर्ट मोहम्मद साबिर
