कासगंज के सहावर में हरे पेड़ों का कटान थमने का नाम नहीं ले रहा—आखिर क्यों? क्या वन विभाग भी शक के घेरे में?
कासगंज (सहावर)
सहावर क्षेत्र में हरे पेड़ों का अवैध कटान अब एक खुला राज बन चुका है। शिकायतें दर्ज होने के बावजूद पेड़ों की कटाई लगातार जारी है, इतना ही नहीं बाग ले बाग काटे जा रहे हैं और स्थानीय लोग अब इस बात पर सवाल उठाने लगे हैं कि क्या इस पूरे खेल में वन विभाग की नाकामी है या विभाग के कुछ लोग भी इस अवैध कारोबार की छाया में खड़े हैं। क्षेत्र में लगभग हर दूसरी आरा मशीन पर अवैध लकड़ी खुलेआम पहुँच रही है, लेकिन कार्रवाई का कहीं नामो-निशान नहीं दिखता।
यह सवाल अब पूरे जिले में गूंज रहा है—“पेड़ कट रहे हैं, मशीनें चल रही हैं, लकड़ी बिक रही है, फिर विभाग सो क्यों रहा है?”
पेड़ों पर चल रही कुल्हाड़ियाँ — और बढ़ रहा है डर का माहौल:-
सहावर के आसपास के ग्रामीण इलाकों में नीम, आम, गूलर, जामुन, पीपल जैसे मूल्यवान पेड़ों की कटाई इस तरह की जा रही है मानो यह कोई वैध गतिविधि हो। कई क्षेत्रों में लोग सुबह उठते ही देखते हैं कि जिस पेड़ ने गाँव को छाया दी थी, वही रातों-रात गायब हो गया।
ग्रामीण बताते हैं कि कटान रात 11 बजे से लेकर सुबह 4 बजे के बीच सबसे अधिक होता है। अंधेरा, सन्नाटा, खाली सड़कें—और ट्रैक्टर/मिनी ट्रक में लदी लकड़ियाँ।
ग्रामीणों ने कई बार मशीनों पर अचानक छापेमारी की मांग की, लेकिन कार्रवाई लगभग “कागजों में” ही नजर आई। हर आरा मशीन पर पहुँच रही है अवैध लकड़ी — कैसे हो रहा इतना बड़ा खेल?
सहावर क्षेत्र में कई आरा मशीनें चल रही हैं, और इनमें से अधिकतर पर ग्रामीणों के अनुसार “अभेद लकड़ी” नियमित रूप से पहुँच रही है।
इन मशीनों पर अक्सर ऐसे पेड़ों की लकड़ी मिलती है जिनके कटान पर कानूनी अनुमति नहीं होती, या फिर जिस क्षेत्र से वे लाई गई हैं, वहाँ किसी प्रकार की परमिशन का रिकॉर्ड नहीं होता।
मशीन मालिकों से पूछा जाए तो वे अक्सर एक ही जवाब देते हैं—“हमें तो पहले से कटी लकड़ी मिलती है, हम क्या कर सकते हैं?”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब लकड़ी किसी भीL प्रकार की अनुमति के बिना काटी जा रही है, तो वह बिना पकड़े मशीन तक पहुँच कैसे जाती है?
क्या वन विभाग की नज़रों से यह सब बच जाता है?
या फिर नज़रें हटाई जा रही हैं?
वन विभाग पर गंभीर सवाल—क्या वाकई अनदेखी है या मौन सहमति?
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि शिकायतें तो दर्ज होती हैं, लेकिन उनके बाद दो ही चीजें दिखाई देती हैं:
1. कागज़ों में कार्रवाई
2. जमीनी स्तर पर शून्य परिणाम
कुछ लोगों का कहना है कि यह पूरा नेटवर्क बहुत सुदृढ़ तरीके से काम करता है—
पेड़ काटने वालों से लेकर लकड़ी ढोने वालों तक और फिर मशीन तक पहुँचाने वाले तक, सब एक सिस्टम की तरह चलते हैं। और यह सिस्टम बिना “ऊपर तक पहुंच” के काम करे, ऐसा होना मुश्किल है।
कई ग्रामीणों का यह भी कहना है कि वन विभाग के कुछ कर्मियों को शिकायत दी जाती है, लेकिन वे मौके पर तो नहीं पहुँचते, उल्टा शिकायतकर्ता को ही सलाह दे देते हैं कि “भाई, इस चक्कर में मत पड़ो, परेशान हो जाओगे।”
ऐसे में लोगों में ये सवाल उठना जायज़ है—
क्या विभाग की चुप्पी सिर्फ लापरवाही है, या फिर इसमें कोई आर्थिक खेल भी छिपा है?
अवैध लकड़ी का स्रोत—कहाँ से आ रही है इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी ?
यह बात सभी जानते हैं कि एक–दो पेड़ों की लकड़ी से मशीनों का कारोबार नहीं चलता। जितने बड़े पैमाने पर लकड़ी मशीनों पर पहुँच रही है, उससे साफ है कि: लगातार कटान हो रहा है । बड़े वाहनों में सप्लाई हो रही है। और कई इलाके “हॉटस्पॉट” बन चुके हैं
ग्रामीणों की मानें तो कटान अक्सर खेतों के किनारों, नहर पटरी, खाली सरकारी कुलाई, जंगल के साइड वाले क्षेत्र और गाँव के बाहर के सुनसान इलाकों में ज्यादा होता है।
कई जगहों पर कटान के बाद जड़ें मिट्टी से छुपा दी जाती हैं ताकि बाहर से लगे कि कभी कोई पेड़ था ही नहीं।
नीतियाँ और कानून मौजूद—लेकिन पालन कौन करे?
भारत में हरे पेड़ों के कटान को लेकर कानून बेहद सख्त हैं।
यूपी में बिना अनुमति किसी हरे पेड़ को काटना वन अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है, जिसके लिए भारी जुर्माने और जेल तक का प्रावधान है। लेकिन सहावर में हालात बिल्कुल उलटे दिखाई देते हैं।
कानून किताबों में हैं, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और कहते हैं।
मामला सिर्फ पेड़ काटने का नहीं, बल्कि प्राकृतिक संपदा की लूट का है।
स्थानीय प्रशासन की भूमिका—नरमी या मजबूरी?
ग्रामीण यह भी कह रहे हैं कि पुलिस को भी अक्सर इसकी खबर रहती है।
कई बार तो लकड़ी खुलेआम सड़कों से गुजर रही होती है, लेकिन उसे रोका नहीं जाता।
लोगों के मन में एक बड़ा सवाल यह भी है—
क्या विभाग पर कटान माफियाओं का दबाव है?
या
क्या रिश्वत का पैसा इस खेल को और मजबूत कर रहा है?
यदि विभाग और पुलिस दोनों जाग जाएँ, तो यह खेल एक हफ्ते में रुक सकता है। लेकिन पिछले कई महीनों से कटान कम होने के बजाय और तेज होता जा रहा है।
पर्यावरण पर संकट—सहावर का भविष्य खतरे में
पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होते—वे जीवंत प्रणाली हैं।
सहावर में लगातार कटाई के कारण:
गर्मी पहले से तेज हो गई है
बारिश का पैटर्न बिगड़ रहा है
खेतों में नमी कम हो रही है
हवा में धूल बढ़ रही है
पक्षियों का निवास खत्म हो रहा है
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह कटान नहीं रुका, तो आने वाले 10–15 वर्षों में इस क्षेत्र में जलस्तर, तापमान और वायु गुणवत्ता जैसे मामलों में गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
किसकी जिम्मेदारी है यह सब रोकने की?
कानून के मुताबिक यह जिम्मेदारी इनकी है:
1. वन विभाग
सबसे पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी विभाग की है कि
पेड़ों का अवैध कटान न हो, लकड़ी की ढुलाई रोकी जाए और मशीनों की नियमित जांच हो।
2. पुलिस विभाग
रात में होने वाले कटान और ट्रैक्टर/वाहनों की आवाजाही को रोकना पुलिस का कर्तव्य है।
3. जिला प्रशासन
डीएम और एसडीएम को शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।
4. ग्राम पंचायत/स्थानीय लोग
जागरूकता और निगरानी का कार्य स्थानीय स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन फिलहाल चारों ओर यही दिख रहा है कि जिम्मेदारों के बीच तालमेल तो है । लेकिन कटान रोकने के लिए नहीं, बल्कि चुप्पी बनाए रखने के लिए।
क्या वन विभाग शामिल है?—जवाब तलाशना पड़ेगा
आरोप प्रत्यक्ष रूप से विभाग पर नहीं लगाए जा सकते, लेकिन परिस्थितियाँ लगातार संदेह पैदा कर रही हैं।
कार्रवाई का अभाव:-
अवैध लकड़ी की निरंतर सप्लाई
मशीनों पर छापेमारी न होना
शिकायतकर्ताओं को हतोत्साहित करना
और वर्षों से जारी यही पैटर्न
ये सब मिलकर दिखाते हैं कि कहीं न कहीं कुछ बहुत बड़ा गलत हो रहा है।
यदि विभाग ईमानदारी से चाहे, तो 24 घंटे में इस अवैध कटान की जड़ें पकड़ ली जाएँ। लेकिन जब शिकायतें वर्षों से आ रही हों और परिणाम शून्य हो— तो सवाल उठना लाज़मी है कि क्या विभाग के कुछ लोग भी इस नेटवर्क का हिस्सा हैं?
ग्रामीणों की मांग—जिला स्तर पर विशेष जांच दल (SIT) बने
स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ता अब यह मांग कर रहे हैं कि:
वन विभाग के कर्मचारियों की भी जांच हो
मशीनों की रजिस्टर/इनवॉइस की जांच हो
लकड़ी सप्लाई के रूट ट्रेस किए जाएँ
रात्रि गश्त बढ़ाई जाए
बड़े स्तर पर कार्रवाई की जाए
लोग कहते हैं कि “छोटे–मोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई से कुछ नहीं होगा, असली खेल ऊपर खेला जा रहा है।”
निष्कर्ष—सहावर के जंगलों का भविष्य अब सरकारी जागरूकता पर निर्भर
सहावर में हरे पेड़ों का कटान अब एक साधारण अपराध नहीं, बल्कि , एक संगठित माफिया नेटवर्क की तरह विकसित हो चुका है।
वन विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन अगर तुरंत सख्त कदम नहीं उठाते, तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र पेड़ों से नहीं, बल्कि बंजर भूमि और बढ़ती गर्मी के लिए पहचाना जाएगा।
पेड़ों को काटना आसान है, लेकिन उस पेड़ को वापस बड़ा होने में 20–25 साल लगते हैं।
अब सवाल यह है—
क्या विभाग जागेगा? या सहावर के पेड़ इसी तरह कटते रहेंगे?








