सभी सरकारें देशब्यापी लॉकडाउन में कोरोना के चलते मध्यमवर्ग की आतंरिक वेदना समझें : लोधी राजेश राजपूत कोरोना के कहर से मध्यमवर्गीय परिवार अपने कवच और कुंडल उतारने पर मजबूर : लोधी राजेश राजपूत
रिपोर्ट श्रीनिवास राजपूत
सार्थक संवाद संसद के संयोजक लोधी राजेश राजपूत ने मध्यमवर्गीय परिवारों की आंतरिक वेदना का सटीक चित्रण करते हुए लिखा है कि कोरोना के कहर के चलते भारत में चल रहे देशब्यापी लॉकडाउन में 100 नम्बर की एक पुलिस की गाड़ी मेन रोड पर एक दो मंजिले मकान के बाहर आकर रुकी।कांस्टेबल को फ़ोन पर यही पता लिखाया गया था पर यहां तो सभी दुमंजिला मकान है।यहां पर खाना किसने मंगवाया होगा?यही सोचते हुए कांस्टेबल ने उसी नम्बर पर कॉलबैक की।"अभी दस मिनट पहले इस नम्बर से भोजन के लिए फोन किया गया था।आप राम जी बोल रहे हैं क्या?हम मकान न0109 के सामने खड़े हैं, कहाँ आना है।"
दूसरी तरफ से जबाब आया ,"आप वहीं रुकिए, मैं आ रहा हूं।"एक मिनट बाद 109 न0 मकान का गेट खुला और करीब 70 वर्षीय सज्जन बाहर आए।उन्हें देखते ही कांस्टेबल गुस्से में बोला "आप को शर्म नही आई, इस तरह से फोन करके खाना मंगवाते हुए,गरीबों के हक का जब "आप जैसे अमीर" खाएंगे तो गरीब तक खाना कैसे पहुंचेगा।" मेरा यहां तक आना ही बर्बाद गया।"
तब उस बुजुर्ग सज्जन ने साहस करके बोलना शुरू किया कि... साहब !ये दिखावटी अमीरी और ये शर्म ही थी जो हमें यहां तक ले आयी।सर्विस लगते ही शर्म के मारे लोन लेकर घर बनवा लिया।आधे से ज्यादा सेलरी क़िस्त में कटती रही और आधी बच्चों की परवरिश में जाती रही।अब रिटायरमेंट के बाद कोई पेंशन नहीं थी तो मकान का एक हिस्सा किराये पर दे दिया।अब लाक डाउन के कारण किराया भी नहीं मिला।बेटे की सर्विस न लगने के कारण जो फंड मिला था उससे बेटे को व्यवसाय करवा दिया और वो जो भी कमाता गया व्यवसाय बड़ा करने के चक्कर में उसी में लगाता गया कभी मुनाफा कभी नुकसान का दौर भी झेला।बहन भाइयों के संयुक्त परिवार के पालन पोषण में कभी बचत करने के लिए उसने सोचा ही नही।अब 20 दिन से वो भी ठप्प है। पहले साल भर का गेंहू-चावल भर लेते थे पर बहू को वो सब ओल्ड फैशन लगता था तो शर्म के मारे दोनो टँकी कबाड़ी को दे दीं।अब बाजार से दस किलो पैक्ड आटा और पांच किलो चावल ले आते हैं।राशन कार्ड बनवाया था तो बच्चे वहां से शर्म के मारे राशन उठाने नहीं जाते थे कि कौन लाइन लगाने जाय इसलिए वो भी निरस्त हो गया।जनधन अकाउंट हमने ही बहू का खोलवा दिया था,पर उसमें एक भी बार न तो जमा हुआ न ही निकासी हुई और खाता बन्द हो गया।इसलिये सरकार से आये हुए पैसे भी नहीं निकाल सके।मकान होने के कारण शर्म के मारे किसी सामाजिक संस्था से भी मदद नही मांग सकते थे।कल से जब कोई रास्ता नहीं दिखा और सुबह जब पोते को भूख से रोते हुए देखा तो सारी शर्म एक किनारे रख कर 100 नम्बर डायल कर दिया।इन दीवारों ने हमको अमीर तो बना दिया साहब ! पर अंदर से खोखला कर दिया।
मजदूरी कर नहीं सकते थे और आमदनी इतनी कभी हुई नहीं कि बैंक में इतना जोड़ लेते की कुछ दिन बैठकर जीवन व्यतीत कर लेते।आज कल बेरोजगारी की मार झेल रहे पढे लिखे जवान बच्चों में हताशा और निराशा का विकट गुस्सा है।आप ही बताओ ! मैं क्या करता।कहते हुए बुजुर्ग सज्जन फफक कर रो पड़े।और बोले मेरा दर्द ही आज भारत के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों का दर्द है।अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवारों के घर घर की वास्तविक यही कहानी है।ऐसा प्रतीत होता है कि कोरोना भारत में मध्यम वर्गीय परिवारों की शर्म और दिखावटी बनावटी झूठी शान के कवच और कुंडल उतारने का संकल्प लेकर आया है।
गरीब,मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवार कोरोना कोविड-19 वाइरस के कहर के कारण मरने से पहले भूख और बेरोजगारी से मरने पर मजबूर होते दिखाई देने लगे हैं।केंद्र और राज्य सरकारों को लोकतंत्र के असली जनमत को कोरोना के साथ साथ "भूख और बेरोजगारी"से बचाने के लिए शीघ्र अति शीघ्र कारगर कदम उठाने चाहिए।
कांस्टेबल को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले।वो चुपचाप गाड़ी तक गया और लंच पैकेट निकालने लगा।तभी उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने कल राशन व घर का जो भी सामान मंगवाया था वो कल से घर न जा पाने के कारण डिग्गी में ही पड़ा हुआ है।उसने डिग्गी खोली, सामान निकाला और लंच पैकेट के साथ साथ सारा सामान बुजर्ग सज्जन के गेट पर रखा और बिना कुछ बोले गाड़ी में आकर बैठ गया।गाड़ी फिर किसी ऐसे ही "भाग्यहीन अमीर" का घर ढूंढने जा रही थी।जमीन से जुड़कर ड्यूटी कर रहे कांस्टेबल को मध्यम वर्गीय परिवार की पीड़ा समझ आ गयी मगर इंतजार इस बात का है कि केंद्र और राज्य सरकारें भी जमीन से जुड़कर कब अपनी ड्यूटी निभाएंगी।कब मध्यमवर्गीय परिवारों की वेदना को समझकर कारगर कदम उठाएगी।इसका देश के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों को भी बेसब्री से इन्तजार है।आज के मध्यमवर्ग की यही वास्तविक स्थिति है।
लोधी राजेश राजपूत
संयोजक:सार्थक संवाद संसद
सार्थक संवाद संसद के संयोजक लोधी राजेश राजपूत ने मध्यमवर्गीय परिवारों की आंतरिक वेदना का सटीक चित्रण करते हुए लिखा है कि कोरोना के कहर के चलते भारत में चल रहे देशब्यापी लॉकडाउन में 100 नम्बर की एक पुलिस की गाड़ी मेन रोड पर एक दो मंजिले मकान के बाहर आकर रुकी।कांस्टेबल को फ़ोन पर यही पता लिखाया गया था पर यहां तो सभी दुमंजिला मकान है।यहां पर खाना किसने मंगवाया होगा?यही सोचते हुए कांस्टेबल ने उसी नम्बर पर कॉलबैक की।"अभी दस मिनट पहले इस नम्बर से भोजन के लिए फोन किया गया था।आप राम जी बोल रहे हैं क्या?हम मकान न0109 के सामने खड़े हैं, कहाँ आना है।"
दूसरी तरफ से जबाब आया ,"आप वहीं रुकिए, मैं आ रहा हूं।"एक मिनट बाद 109 न0 मकान का गेट खुला और करीब 70 वर्षीय सज्जन बाहर आए।उन्हें देखते ही कांस्टेबल गुस्से में बोला "आप को शर्म नही आई, इस तरह से फोन करके खाना मंगवाते हुए,गरीबों के हक का जब "आप जैसे अमीर" खाएंगे तो गरीब तक खाना कैसे पहुंचेगा।" मेरा यहां तक आना ही बर्बाद गया।"
तब उस बुजुर्ग सज्जन ने साहस करके बोलना शुरू किया कि... साहब !ये दिखावटी अमीरी और ये शर्म ही थी जो हमें यहां तक ले आयी।सर्विस लगते ही शर्म के मारे लोन लेकर घर बनवा लिया।आधे से ज्यादा सेलरी क़िस्त में कटती रही और आधी बच्चों की परवरिश में जाती रही।अब रिटायरमेंट के बाद कोई पेंशन नहीं थी तो मकान का एक हिस्सा किराये पर दे दिया।अब लाक डाउन के कारण किराया भी नहीं मिला।बेटे की सर्विस न लगने के कारण जो फंड मिला था उससे बेटे को व्यवसाय करवा दिया और वो जो भी कमाता गया व्यवसाय बड़ा करने के चक्कर में उसी में लगाता गया कभी मुनाफा कभी नुकसान का दौर भी झेला।बहन भाइयों के संयुक्त परिवार के पालन पोषण में कभी बचत करने के लिए उसने सोचा ही नही।अब 20 दिन से वो भी ठप्प है। पहले साल भर का गेंहू-चावल भर लेते थे पर बहू को वो सब ओल्ड फैशन लगता था तो शर्म के मारे दोनो टँकी कबाड़ी को दे दीं।अब बाजार से दस किलो पैक्ड आटा और पांच किलो चावल ले आते हैं।राशन कार्ड बनवाया था तो बच्चे वहां से शर्म के मारे राशन उठाने नहीं जाते थे कि कौन लाइन लगाने जाय इसलिए वो भी निरस्त हो गया।जनधन अकाउंट हमने ही बहू का खोलवा दिया था,पर उसमें एक भी बार न तो जमा हुआ न ही निकासी हुई और खाता बन्द हो गया।इसलिये सरकार से आये हुए पैसे भी नहीं निकाल सके।मकान होने के कारण शर्म के मारे किसी सामाजिक संस्था से भी मदद नही मांग सकते थे।कल से जब कोई रास्ता नहीं दिखा और सुबह जब पोते को भूख से रोते हुए देखा तो सारी शर्म एक किनारे रख कर 100 नम्बर डायल कर दिया।इन दीवारों ने हमको अमीर तो बना दिया साहब ! पर अंदर से खोखला कर दिया।
मजदूरी कर नहीं सकते थे और आमदनी इतनी कभी हुई नहीं कि बैंक में इतना जोड़ लेते की कुछ दिन बैठकर जीवन व्यतीत कर लेते।आज कल बेरोजगारी की मार झेल रहे पढे लिखे जवान बच्चों में हताशा और निराशा का विकट गुस्सा है।आप ही बताओ ! मैं क्या करता।कहते हुए बुजुर्ग सज्जन फफक कर रो पड़े।और बोले मेरा दर्द ही आज भारत के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों का दर्द है।अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवारों के घर घर की वास्तविक यही कहानी है।ऐसा प्रतीत होता है कि कोरोना भारत में मध्यम वर्गीय परिवारों की शर्म और दिखावटी बनावटी झूठी शान के कवच और कुंडल उतारने का संकल्प लेकर आया है।
गरीब,मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवार कोरोना कोविड-19 वाइरस के कहर के कारण मरने से पहले भूख और बेरोजगारी से मरने पर मजबूर होते दिखाई देने लगे हैं।केंद्र और राज्य सरकारों को लोकतंत्र के असली जनमत को कोरोना के साथ साथ "भूख और बेरोजगारी"से बचाने के लिए शीघ्र अति शीघ्र कारगर कदम उठाने चाहिए।
कांस्टेबल को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले।वो चुपचाप गाड़ी तक गया और लंच पैकेट निकालने लगा।तभी उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने कल राशन व घर का जो भी सामान मंगवाया था वो कल से घर न जा पाने के कारण डिग्गी में ही पड़ा हुआ है।उसने डिग्गी खोली, सामान निकाला और लंच पैकेट के साथ साथ सारा सामान बुजर्ग सज्जन के गेट पर रखा और बिना कुछ बोले गाड़ी में आकर बैठ गया।गाड़ी फिर किसी ऐसे ही "भाग्यहीन अमीर" का घर ढूंढने जा रही थी।जमीन से जुड़कर ड्यूटी कर रहे कांस्टेबल को मध्यम वर्गीय परिवार की पीड़ा समझ आ गयी मगर इंतजार इस बात का है कि केंद्र और राज्य सरकारें भी जमीन से जुड़कर कब अपनी ड्यूटी निभाएंगी।कब मध्यमवर्गीय परिवारों की वेदना को समझकर कारगर कदम उठाएगी।इसका देश के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों को भी बेसब्री से इन्तजार है।आज के मध्यमवर्ग की यही वास्तविक स्थिति है।
लोधी राजेश राजपूत
संयोजक:सार्थक संवाद संसद
