जंग ए आज़ादी में एहतेजाजी उर्दू शायरी का था अहम किरदार (प्रोफेसर फज़ले इमाम रिज़वी)
*"उर्दू की एहतेजाजी शायरी बिसवीँ सदी में" का हुआ विमोचन*
*"वक्ताओं ने पुस्तक को आने वाली पीढ़ी के लिए बताया अनमोल रत्न"*
*"शायरों ने अपने बेहतरीन अशआर से लोगों की बटोरी जमकर दाद"*
करैली के लगन पैलेस में बज़्मे इरतेक़ा ए उर्दू अदब के बैनर तले पूर्व स्टैण्डिंग काउन्सिल डॉ लियाक़त अली सिद्दीक़ी द्वारा लिखी उर्दू की एहतेजाजी शायरी बीसवीं सदी पुस्तक के रस्मे इजरा (विमोचन) अवसर पर अपने अध्यक्षी सम्बोधन में इलाहाबाद विश्वविद्धालय के प्रोफैसर फज़ले इमाम रिज़वी
साहब ने पुस्तक के क़सीदे गढ़ते हुए लियाक़त साहब की उम्र की इस पड़ाव पर एहतेजाजी तेवर की सराहना की।कहा एहतेजाज को बग़ावती तेवर न समझते हुए यह समझा जाए की हम अपने हक़ और हुक़ूक़ की खातिर मोतबाराना तरीक़े से सामने वाले से सलीक़े से अपनी फरियाद को पहोंचाना और उस पर रद्दोअमल की तवक़्क़ो रखना होता है।उनहोने उर्दू शायरी के एहतेजाजी तेवर की बात करते हुए कहा की जंग ए आज़ादी में नामी शायरों ने अपनी एहतेजाजी शायरी से एक अहम किरदार निभाया था और कई ऐसे शायर हुए जिनहे
अंग्रेज़ हुकमरानों ने जेल भी भेजा।लेकिन जेल से भी शायरों ने अपने एहतेजाजी तेवर को धार दी।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि क़मरुल हसन सिद्दीक़ी ने फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म """हम देखैंगे-लाज़िम है की हम भी देखेंगे"" का ज़िक्र करते हुए उनकी एहतेजाजी शायरी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ियाउल हक़ के बीच के मतभेद का इस नज़्म से एहतेजाजी तेवर से रुबरु कराते हुए सीद्दीक़ी साहब की पुस्तक के एक एक पन्नों को सलीक़े से लिखी और आने वाली पीढ़ी के लिए अनमोल रत्न करार दिया।कार्यक्रम में विशिष्ट अताथि अब्दुल क़ादरी जाफरी साहब, काज़िम आब्दी ने भी तफसीली तक़रीर मे एहतेजाजी उर्दू शायरी पर अपनी बात रखी।कार्यक्रम का संचालन (निज़ामत) बख्तियार युसूफ एडवोकेट ने किया।वहीं किताब के रस्मे इजरा के बाद शायराना महफिल भी सजाई गई।जिसमें ख्याति प्राप्त शायरों ने एक से बढ़ कर एक कलाम पढ़ते हुए जम कर दाद बटोरी।इस मौक़े पर श्रीमती शकीला बेगम,एडवोकेट सीमाब जहान,डॉ नियामत अली,डॉ वाहिद अली,राशिद अली,शाहिद अली,अशरफ अली सिद्दीक़ी,मो०महफूज़ अहमद,शेख तौक़ीर अहमद नजमी,सै०मो०अस्करी,असद अली काज़मी आदि मौजूद रहे।
भवदीय
सै०मो०अस्करी
रिपोर्ट मोहम्मद साबिर

